IMG-20211009-WA0003-removebg-preview-1.png

भारत देश में गेहूं का उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है लगभग देश के सभी राज्यों में किसान गेहूं की खेती करते हैं |  गेहूं में बीमारियों सुत्रकृमियों तथा हानिकारक कीटों के कारण 5–10 प्रतिशत उपज की हानि होती है और दानों तथा बीजों की गुणवत्ता भी खराब होती है | गेहूं की नई प्रजातियों को जारी करने से पहले रतुआ रोग तथा पर्ण झुलसा रोगों की प्रतिरोधिता के लिए कई साल तक जांचा जाता है तथा अन्य बीमारियों तथा कीटों के लिए कम से कम दो साल तक परीक्षण किया जाता है | इनमें से केवल उच्च प्रतिरोधिता वाली प्रजातियों की ही संस्तुति की जाती हैं |

समय के साथ–साथ रोगजनकों का भी विकास होता रहता है और प्रकृति में इनकी नवीनतम प्रजातियाँ विकसित होती रहती है | किसान समाधान गेहूं में लगने वाले सभी तरह के रोग कि जानकारी तथा उनकी पहचान एवं रोकथाम लेकर आया है | यह रोग सभी देशों में अलग – अलग तरह के होते है।  इसलिए आपको इनकी जानकारी रखना जरुरी है।  जिससे आप भी अपने गेहूं की फसल की पैदावार को बढ़ा सकें।

किसान भाइयों आप यह ब्लॉग GEEKEN CHEMICALS के द्वारा पढ़ रहें है।  हम किसान की फसल सुरक्षा के लिए बेहतर तरीके का कीटनाशक , खरपतवार नाशक कैमिकल बनाते है , और उनकी फसलों को सुरक्षा प्रदान करते है।  आप हमारे द्वारा बना हुआ कैमिकल अपने नजदीकी स्टोर पर जाकर आसानी से खरीद सकते है।

यह भी पढ़ेंः जानिए कब और कैसे करें कपास की खेती, साथ ही रोगों से बचानें के उपाय

Contents

 गेहूं का पर्ण रतुआ / भूरा रतुआ रोग 

यह पक्सीनिया रिकोंडिटा ट्रिटिसाई नामक कवक से होता है तथा सम्पूर्ण भारत में पाया जाता है | किसान भाइयों इस रोग की शुरुआत उत्तर भारत के हिमालय और दक्षिण भारत की नीलगिरि पर्वत के पास शुरू होती है।  वहां से चलने वाली तेज़ हवा के द्वारा यह मैदानी क्षेत्र में पहुँचता है , जिसके बाद यह गेहूं की फसल को संक्रमित करता है।  इसकी वजह से गेहूं की फसल पूरी तरह से ख़राब हो जाती है , जिसकी वजह से किसान अक्सर परेशान रहते है।  किसान के लिए बेहतर यही होगा कि समय रहते इसकी देखभाल करना चाहिए।

 रोग कि पहचान 

इस रोग की पहचान यह है कि शुरू में यह नारंगी रंग का दिखाई पड़ता है।  यह सुई के नोक के जैसे बिंदुओं के आकार का बिना किसी क्रम के पत्तियों के ऊपरी साथ पर दिखाई पड़ते है। कुछ समय के बाद घने होकर पूरी पत्तियों पर फ़ैल जाते है। रोगी पत्तियां जल्दी सुख जाती है जिससे प्रकाश संश्लेषण में भी कमी होती है और दाना हल्का बनता है | गर्मी बढने पर इन धब्बों का रंग, पत्तियों की निचली सतह पर काला हो जाता है तथा इसके बाद यह रोग आगे नहीं फैलता है | इस रोग से गेहूं की उपज में 30 प्रतिशत तक की हानि हो सकती है |

 उपाय 

गेहूं में लगने वाले इस रोग से छुटकारा पानें के लिए आप Shine Grip का प्रयोग कर सकते है।  Shine Grip  को GEEKEN CHEMICALS के द्वारा बनाया गया है।  इसका प्रयोग आप अपने फसल में लगने वाले रोगों के हिसाब से कर सकते है।  यह सबसे भरोसेमंद कीटनाशक में से एक है।  अगर इसके मूल्य की बात करें तो , GEEKEN CHEMICALS के किसान भाइयों के बजट को धयान में रखकर बनाया है।

 पीला रतुआ रोग 

यह पक्सीनिया स्ट्राईफारमिस नामक कवक से होता है | इस रोग के लक्षण प्रारम्भ में पत्तियों के उपरी सतह पर पीले रंग की धारियों के रूप में देखने को मिलते हैं जो कि धीरे–धीरे पूरी पत्तियों को पीला कर देते हैं तथा पीला पाउडर जमीन पर भी गिरने लगता है  इस स्थिति को गेहूं में पीला रतुआ कहते हैं| यदि यह रोग कल्ले निकलने वाली अवस्था या इससे पहले आ जाता है तो फसल में बाली नहीं आती है | यह रोग उत्तरी हिमालय की पहाड़ियों से उत्तरी मैदानी क्षेत्र में फैलता है | यह रोग तापमान बढने पर कम हो जाता है तथा पत्तियों पर पीली धारियां काले रंग की हो जाती है | मध्य तथा दक्षिणी क्षेत्रों में यह रोग अधिक तापमान की वजह से नहीं फैलता हैं | समय – समय पर किसान भाइयों को अपने फसल पर कीटनाशक का प्रयोग करना चाहिए।

 रोगों की पहचान 

पीला रतुआ रोग में पत्तों पर अक्सर पिले और संतरे रंग की धारियां बन जाती है।  जब भी किसान अपने खेतों में जाकर रतुआ रोग से ग्रस्त पत्तों को अपने हाथ से रगड़ते है।  इसके कण भी अक्सर अंगुली या अंगूठे में चिपकने लगते है और यह हलदीनुमा हो जाता है।

 उपाय 

किसान भाइयों अगर आपके फसल में पीला रतुआ रोग या फिर इसके लक्षण दिखाई पड़ रहें है तो आप  GEEKEN  केमिकल्स के द्वारा बना कीटनाशक Yakoo का प्रयोग कर सकते है।  यह कैमिकल आपको बहुत ही किफायती दामों में उपलब्ध हो जायेगा।  इसके साथ ही यह पीला रतुआ रोग को पूरी तरह से खतम कर है।

यह भी पढ़ेंः What Are The General Uses Of Pesticides??

 गेहूं का तना रतुआ या काला रतुआ रोग 

इस रोग का रोग जनक पक्सीनिया ग्रैमिनिस ट्रिटिसाई नामक कवक है | यह रोग प्रारम्भ में निलगिरी तथा पलनी पहाड़ियों से आता है तथा इसका प्रकोप दक्षिण तथा मध्य क्षेत्रों में अधिक होता है | उत्तरी क्षेत्र में यह रोग फसल पकने के समय पहुँचता है | इसलिए इसका प्रभाव नगण्य होता है | यह रोग अक्सर 20 डिग्री नगण्य सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर फैलता है | इस रोग के लक्षण तने तथा पत्तियों पर चाकलेट रंग जैसा काला हो जाता है | दक्षिण तथा मध्य क्षेत्रों में जारी की नवीनतम प्रजातियाँ इस रोग के लिए प्रतिरोधी होती है | हालांकि लोक -1 जैसी प्रजातियों में यह रोग काफी लगता है |

 रोगों की पहचान 

यह रोग अक्सर 20 डिग्री सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर फैलता है। इस रोग के लक्षण तने तथा पत्तियों पर चाकलेट रंग जैसा काला हो जाता है। दक्षिण तथा मध्य क्षेत्रों की नवीनतम प्रजातियां इस रोग के लिए प्रतिरोधी होती है। इस दिशा में देश एवं विदेश में अनुसंधान जोरों से चल रहा है तथा देश में ज्यादा चिंता का विषय नहीं है।

 उपाय

तना रतुआ या काला रतुआ रोग बहुत ही भयानक रोग में से एक है।  यह भी गेहूं की फसल में लगता है पूरी की पूरी फसल को नष्ट कर देता है।  किसान भाइयों हम चाहते है कि आपकी फसल पूरी तरह से सुरक्षित रहें इसलिए GEEKEN CHEMICALS आपके लिए लेकर आया Kenzeb (Mancozeb 75% WP) जिसके प्रयोग मात्र से रोग खत्म हो जाता है और फसल तेजी से ग्रोथ करने लगता है।

 निष्कर्ष 

आपने यहाँ जाना कि गेहूं कि फसल में लगने वाले प्रमुख रोग कौन – कौन से है और उन्हें खत्म करने के लिए किस तरह के कैमिकल का प्रयोग करना चाहिए।  किसान भाइयों आशा है कि आपको हमारा यह ब्लॉग पसंद आया होगा।  GEEKEN CHEMICALS आपके खेती से जुड़े ब्लॉग इसी तरह से लता रहेगा।  आप हमारे इस ब्लॉग को शेयर जरूर करें , जिससे और भी किसान भाइयों तक यह जानकारी उपलब्ध हो सकें और वह भी अपने फसलों की सुरक्षा कर सकें।